आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लोगों के काम करने का तरीका बदल रहा है, और साइबर अपराधी उसी तकनीक का इस्तेमाल ठगी, ब्लैकमेल और पहचान की धोखाधड़ी को ज्यादा भरोसेमंद बनाने में कर रहे हैं। कहीं किसी की आवाज की हूबहू नकल कर करोड़ों रुपये ट्रांसफर कराए जा रहे हैं, तो कहीं एआई से तैयार वीडियो को असली सीसीटीवी फुटेज बताकर फैलाया जा रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने जुलाई 2026 में जारी एक बयान में डीपफेक को सिंथेटिक ऑडियो, वीडियो और टेक्स्ट से जुड़ी तकनीक के रूप में चिह्नित किया था। मंत्रालय ने यह भी बताया था कि आईटी एक्ट की मौजूदा धाराओं के तहत पहचान की चोरी, निजता के उल्लंघन और अश्लील या यौन रूप जैसे कई अपराधों पर कार्रवाई का प्रावधान है।
देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आए मामलों से पता चलता है कि एआई का इस्तेमाल अपराध की दुनिया में अब कोई नया मॉडल नहीं रहा है, बल्कि पुराने अपराधों को ज्यादा विश्वसनीय और खतरनाक बना रहा है। पांच हालिया मामले बताते हैं कि यह दुरुपयोग कैसे फैल रहा है।
क्लोन की गई आवाज से 10 करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी का आरोप
जून में दिल्ली पुलिस ने एआई आधारित वॉयस क्लोनिंग से जुड़ी कथित ठगी के मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने कहा कि गिरोह ने मुंबई की एक कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर की आवाज की नकल की और फिर वरिष्ठ अधिकारी बनकर कंपनी के डिप्टी जनरल मैनेजर से संपर्क कर अलग-अलग खातों में रकम ट्रांसफर करने के निर्देश दिए।
जांच में सामने आया कि पैसा 63 बैंक खातों के जरिए आगे भेजा गया और कुल रकम 10 करोड़ रुपये से अधिक थी। मामला तब खुला, जब आरोपियों में से एक कथित तौर पर 9 लाख रुपये का चेक भुनाने बैंक पहुंचा। बैंक मैनेजर को लेनदेन पर शक हुआ और इसके बाद जांच आगे बढ़ी।
इस मामले में एआई की भूमिका इसलिए अहम है क्योंकि आमतौर पर किसी वरिष्ठ अधिकारी के नाम से फोन करना ठगी का पुराना तरीका है, लेकिन आवाज की नकल ने कथित तौर पर इस धोखे को ज्यादा विश्वसनीय बना दिया।
फर्जी सीसीटीवी वीडियो और आधार जांच को चकमा देने वाला डीपफेक
दिल्ली पुलिस ने हाल में एक एआई जनरेटेड वीडियो के मामले में 24 साल के एक युवक को गिरफ्तार किया। वीडियो में एसीपी विवेक भगत को एक महिला के साथ कथित तौर पर बदसलूकी करते हुए दिखाया गया था। वीडियो को सोशल मीडिया पर प्रदर्शन स्थल का सीसीटीवी फुटेज बताकर वायरल किया गया था।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, वीडियो तैयार करने में एआई टूल्स का इस्तेमाल किया गया। फुटेज के साथ अधिकारी की तस्वीर, नाम और पद भी दिखाया गया, ताकि इसे वास्तविक घटना से जोड़कर देखा जाए। पुलिस ने पलवल निवासी नसीम अहमद अमीन को गिरफ्तार किया है और मामले में अन्य लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। पुलिस ने कहा कि यह वीडियो मामला एक महिला पत्रकार की ओर से लगाए गए आरोपों से अलग है, जिन पर उस समय तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी।
अहमदाबाद में अप्रैल में पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया था। जांचकर्ताओं का आरोप था कि एक कारोबारी के नाम पर फर्जी लोन से जुड़े लेनदेन में आधार आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन को पार करने के लिए एआई जनरेटेड डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल किया गया। जांचकर्ताओं ने कहा कि गूगल के जेमिनी समेत एआई टूल्स की मदद से कारोबारी के डीपफेक वीडियो तैयार किए गए। मामला तब सामने आया, जब कारोबारी ने देखा कि उसे लगातार दो दिनों से बैंक के ओटीपी नहीं मिल रहे हैं। इसके बाद उसने पुलिस से संपर्क किया। यह मामला इसलिए अलग है क्योंकि यहां एआई का कथित इस्तेमाल किसी व्यक्ति को सिर्फ गलत जानकारी देने के लिए नहीं, बल्कि पहचान की पुष्टि करने वाली व्यवस्था को ही चकमा देने के प्रयास में किया गया।
ब्लैकमेल और अपहरण का फर्जी वीडियो
गाजियाबाद में पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें जामिया मिल्लिया इस्लामिया का एक सेकंड ईयर का छात्र भी शामिल बताया गया। मामला एआई से तैयार अश्लील वीडियो और ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग से जुड़ा है।
पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने फेसबुक पर 'नवप्रीत कौर माहिल' नाम से एक फर्जी प्रोफाइल बनाई और कनाडा में रहने वाले एक एनआरआई से संपर्क किया। वीडियो कॉल के दौरान पीड़ित की रिकॉर्डिंग की गई। इसके बाद उसे वीडियो वायरल करने की धमकी दी गई और एआई से तैयार किए गए अश्लील वीडियो के जरिए भी ब्लैकमेल किया गया। पुलिस ने कहा कि आरोपियों ने कथित तौर पर 50 हजार डॉलर यानी करीब 4.7 करोड़ रुपये की मांग की। पीड़ित ने पैसे देने के बजाय साइबर क्राइम टीम से संपर्क किया, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की। पुलिस ने आरोपियों के मोबाइल फोन से एआई-जनरेटेड वीडियो मिलने का भी दावा किया है, हालांकि ये सभी आरोप जांच के दायरे में हैं।
फरवरी में मध्य प्रदेश के इंदौर में एक परिवार कथित तौर पर डीपफेक वीडियो के जरिए ठगी का शिकार हुआ। परिवार के नाबालिग बेटे के लापता होने के बाद ठगों ने परिजनों से संपर्क किया और एक ऐसा वीडियो कॉल दिखाया, जिसमें बच्चे की तस्वीर को इस तरह बदला गया था कि परिवार को लगा कि उसका अपहरण हो चुका है। डर के कारण परिवार ने कथित तौर पर 1 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए। पुलिस ने इसे शहर में डीपफेक तकनीक के जरिए जबरन वसूली का सामने आया पहला मामला बताया था।
पांचों मामले मिलकर बताते हैं कि किसी जानी-पहचानी आवाज या वीडियो पर अब अकेले भरोसा नहीं किया जा सकता। हर मामले में पुलिस ने कहा है कि आरोपों की जांच जारी है, और जांचकर्ताओं की सलाह है कि पैसे की किसी भी तत्काल मांग को किसी अलग, जाने-पहचाने रास्ते से जांचे बिना उस पर कार्रवाई न करें।