जब भारतीय क्रिकेट टीम ने 1983 में पहला वर्ल्ड कप जीता, तो सरकार ने हर खिलाड़ी को विजय सुपर स्कूटर तोहफे में दिया। सत्तर और अस्सी के दशक में, हमारा बजाज के घर-घर पहुंचने से काफी पहले, विजय सुपर भारतीय मिडिल क्लास की पहली पसंद हुआ करता था, और इसके नाम में एक जंग की जीत की याद जुड़ी थी।
स्कूटर का नाम पाकिस्तान के साथ 1971 की जंग में भारत की जीत से प्रेरित था। यह भारतीय सड़कों पर उस जीत का प्रतीक बन गया, और अपनी बेहतरीन स्टाइलिंग और मजबूत परफॉर्मेंस के दम पर इसने एक पूरे दौर को अपनी पहचान दी।
1972 में लखनऊ में शुरुआत
विजय सुपर की नींव 1972 में रखी गई थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लखनऊ में सरकारी उपक्रम स्कूटर्स इंडिया लिमिटेड का शिलान्यास किया था। भारत सरकार ने इटली की मशहूर कंपनी इनोसेंटी के सभी उपकरण और उत्पादन अधिकार खरीदकर इसकी मैन्युफैक्चरिंग भारत में शुरू की थी।
तीन साल बाद स्कूटर्स इंडिया ने अपने विजय और डीलक्स डीएल मॉडल को अपग्रेड करके उसे विजय सुपर नाम से बेचना शुरू किया। विजय का मतलब जीत होता है, और यह नाम 1971 की जंग में मिली भारत की ऐतिहासिक जीत के सम्मान में चुना गया था।
सत्तर-अस्सी के दशक में धूम
सत्तर और अस्सी के दशक में विजय सुपर भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में जाना-माना नाम बन गया। अपनी आकर्षक स्लीक डिजाइन, यूनिक हेडलाइट, आसान स्पीडोमीटर और बीच में लगे इंजन की वजह से यह ग्राहकों के बीच तुरंत सुपरहिट हो गया, और इसका प्रचार सड़कों पर सबसे बेहतरीन डील के तौर पर हुआ।
इस स्कूटर का क्रेज इतना बढ़ा कि 1983 में पहला क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने वाली भारतीय टीम के हर एक खिलाड़ी को सरकार ने विजय सुपर गिफ्ट किया था। स्कूटर देश की लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन चुका था, एक ऐसी मशीन जिसे मिडिल क्लास अपना बनाना चाहता था।
कंपनी ने बाद में तीन-पहिया वाहनों के बाजार में भी कदम रखा और विक्रम और लैंब्रो ब्रांड नाम से तिपहिया वाहन बनाए। कुछ समय तक विजय सुपर और उसके तिपहिया साथियों ने स्कूटर्स इंडिया का नाम पूरे देश में पहुंचाया।
मुकाबला बढ़ा, 1997 में उत्पादन बंद
नब्बे के दशक में हालात मुश्किल हो गए। बजाज के चेतक और प्रिया जैसे नए मॉडल आ गए, और स्पेयर पार्ट्स व मैकेनिक्स की कमी के चलते विजय सुपर की पकड़ कमजोर होने लगी। प्रोडक्ट में विविधता और नए तकनीकी इनोवेशन न ला पाने के कारण स्कूटर्स इंडिया को भारी घाटा हुआ।
1997 में कंपनी ने विजय सुपर स्कूटर का उत्पादन पूरी तरह बंद कर दिया और अपना पूरा फोकस सिर्फ विक्रम थ्री-व्हीलर मैन्युफैक्चरिंग पर केंद्रित कर दिया। थ्री-व्हीलर सेगमेंट में भी कंपनी को अन्य प्रतिस्पर्धियों से कड़ी टक्कर मिली और घाटा जारी रहा।
रिवाइवल की कोशिशें और वापसी की उम्मीद
सरकार ने कंपनी को बचाने की कोशिश की। 2011 में सरकार ने 202 करोड़ रुपये का रिवाइवल पैकेज प्रस्तावित किया। प्लांट में ऊर्जा लागत कम करके और वाहनों का वजन घटाकर कंपनी ने थोड़े समय के लिए मुनाफा कमाया, लेकिन वह लगातार हो रहे नुकसान को रोकने के लिए नाकाफी था।
2016 में नीति आयोग ने स्कूटर्स इंडिया को घाटे में चल रहे पीएसयू की लिस्ट में डालकर इसके विनिवेश की सिफारिश की। 2018 में केंद्र सरकार की 93.47 फीसदी हिस्सेदारी बेचने के लिए टेंडर भी मंगाए गए, लेकिन किसी भी खरीदार ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई।
आज भारतीय सड़कों पर कभी राज करने वाला यह ब्रांड इलेक्ट्रिक वाहन तकनीक के जरिये वापसी की उम्मीद देख रहा है। विजय सुपर अब शोरूमों से गायब है, लेकिन जिस पीढ़ी ने इसके साथ बड़े होने का समय बिताया, उसके लिए यह स्कूटर आज भी उस दौर की याद है जब जंग की जीत के नाम पर बना भारतीय स्कूटर मिडिल क्लास को साथ लेकर चलता था।