यह कहानी है उपेंद्र कुशवाहा की। वह बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बेलवा पकड़िया गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने कृषि में ग्रेजुएशन किया है। डिग्री पूरी करने के बाद कोरोना महामारी के दौर में बाहर जाकर काम करने का उनका सपना टूट गया था। इसके बाद उन्होंने घर पर ही रहकर कुछ नया करने का फैसला किया।
सबसे पहले उन्होंने मशरूम की फार्मिंग के लिए ट्रेनिंग ली। एक छोटी सी मड़ई से इस कारोबार की शुरुआत की। उन्होंने शुरुआती दौर में करीब डेढ़ लाख रुपये का निवेश किया। 700 बैग्स के साथ बटन मशरूम का उत्पादन शुरू किया। मशरूम की खूबी यह होती है कि तैयार बैग से उत्पादन प्रक्रिया सिर्फ 45 दिनों में शुरू हो जाती है। 70 दिनों के भीतर ही पूरी हार्वेस्टिंग खत्म हो जाती है। इससे उन्हें कुछ ही महीनों में मुनाफे का गणित समझ आने लगा।
मड़ई से आधुनिक यूनिट्स तक का सफर
कारोबार में लगातार प्रॉफिट होने पर उपेंद्र ने अपने काम का दायरा बढ़ाया। वह साधारण मड़ई से निकलकर पक्की आधुनिक यूनिट्स तक पहुंच गए। उनका शुरुआती कारोबार जब बढ़कर 50 लाख रुपये के टर्नओवर पर पहुंचा, तब उन्होंने अपनी यूनिट्स की संख्या में भारी बढ़ोतरी की। खुद के स्पॉन बैग्स (मशरूम किट) भी तैयार करने शुरू कर दिए। उन्होंने इनमें बेहतर क्वालिटी पर फोकस किया। इसके साथ ही भरोसेमंद सप्लाई के कारण जिले भर के मशरूम व्यापारी उन्हीं से माल खरीदने लगे। इससे उनकी आमदनी में जोरदार उछाल आया।
करोड़ों का टर्नओवर, चार राज्यों तक सप्लाई
अब उपेंद्र को मशरूम की खेती करते हुए 5 साल से ज्यादा का समय हो चुका है। उनका सालाना टर्नओवर ढाई करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया है। उन्होंने करीब 2000 मशरूम बैग्स की क्षमता वाली करीब 8 आधुनिक यूनिट्स का निर्माण करवाया है। इनसे हर फसल चक्र (45 से 70 दिन) के दौरान करीब 12 टन मशरूम की बंपर हार्वेस्टिंग होती है।
आधुनिक तकनीकों और बेहतर मैनेजमेंट के दम पर वह अपने इस कारोबार को लगातार नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं। अपनी इस आधुनिक और उन्नत खेती के जरिए उपेंद्र कुशवाहा ने स्थानीय स्तर पर रोजगार की मिसाल पेश की है। इसके साथ उन्होंने अपने उत्पादन का दायरा भी काफी बड़ा कर लिया है। उनके फार्म से मशरूम की सप्लाई सिर्फ बिहार के अलग-अलग जिलों तक ही सीमित नहीं है। इसके बजाय उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई बड़े क्षेत्रों तक इसे पहुंचाया जा रहा है। छोटी सी मड़ई से शुरू हुआ उनका सफर आज ग्रामीण युवाओं के लिए उद्यमिता का प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है और आसपास के लोग उन्हें 'मशरूम किंग' कहते हैं।