डबल सेवन की कहानी केवल एक सॉफ्ट ड्रिंक की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब राजनीति, कारोबारी नियम और राष्ट्रीय भावना टकराए, और सरकार ने एक ग्लोबल ब्रांड की जगह देसी ब्रांड लाने की कोशिश की। यह प्रयोग केवल कुछ साल चला, फिर भी इसे आज भी इस बात के केस स्टडी के रूप में पढ़ाया जाता है कि मुख्य रूप से राजनीतिक सोच से शुरू हुआ ब्रांड खुले बाजार में क्यों संघर्ष करता है। यह क्यों उठा और क्यों फीका पड़ा, यह समझना ब्रांडिंग, स्वाद और समय के बारे में बहुत कुछ बताता है।

1977 में भारत तेज बदलाव के दौर में था। इमरजेंसी खत्म हुई थी, सत्ता बदल गई थी और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई थी। उस माहौल में मल्टीनेशनल कंपनियों के खिलाफ लहर चली, और स्वदेशी राष्ट्रवाद को बोतलों में बंद करके बाजार में उतारा गया। इसी पृष्ठभूमि ने कोका-कोला की विदाई और डबल सेवन के जन्म की स्क्रिप्ट लिखी।

तुरंत वजह नियमन था। सरकार ने फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट यानी FERA के नियमों का हवाला देकर विदेशी कंपनियों पर शिकंजा कसा, जिनमें कोका-कोला और IBM शामिल थीं। उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस चाहते थे कि कोका-कोला अपनी हिस्सेदारी घटाए और अपना सीक्रेट फॉर्मूला भी भारतीय शेयरहोल्डर्स से शेयर करे। कंपनी ने ट्रेड सीक्रेट का हवाला देकर फॉर्मूला देने से इनकार कर दिया। इस पर तत्कालीन सरकार ने कंपनी का लाइसेंस रद्द कर दिया। जवाब में स्वदेशी ड्रिंक डबल सेवन को लॉन्च किया गया।

नाम क्यों सोच-समझकर रखा गया

इस नई स्वदेशी कोला का नाम डबल सेवन बहुत सोच-समझकर रखा गया था। यह 1977 के ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव के साल से जुड़ा था। इसकी मैन्युफैक्चरिंग और मार्केटिंग का जिम्मा सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज को मिला, जो पहले मॉडर्न ब्रेड्स बनाती थी। इस ड्रिंक का फॉर्मूला मैसूर में केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान यानी CFTRI से तैयार कराया गया था। प्रगति मैदान के सालाना व्यापार मेले में डबल सेवन को बड़े पैमाने पर आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में पेश किया गया था।

यह उम्मीदों पर क्यों खरी नहीं उतरी

इसके लिए टैगलाइन थी: द टेस्ट दैट टिंगल्स। बाजार में उतरने पर डबल सेवन जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई। कैंपा कोला और थम्स अप जैसे ब्रांड्स से उसे कड़ी टक्कर मिली। यह आम जनता के बीच कोका-कोला जैसी पॉपुलैरिटी भी हासिल नहीं कर सकी। बिजनेस स्कूलों में इसे सरकार समर्थित ब्रांडिंग और स्वदेशी मार्केटिंग के असफल केस स्टडी के तौर पर पढ़ाया जाता है। कारण यह बताया जाता है कि राजनीतिक प्रेरणा से शुरू यह ब्रांड बाजार की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गया।

सफर कैसे थम गया

साल 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई। राजनीतिक समीकरण फिर बदले। इसके साथ ही डबल सेवन का सफर भी थम गया। साल 1991 में पी. वी. नरसिम्हा राव सरकार में आर्थिक उदारीकरण का दौर आया। साल 1993 में कोका-कोला ने भारतीय बाजार में दोबारा धमाकेदार वापसी की। हालांकि, MNCs के इस पलायन ने 1970 से 1990 के दशक के बीच भारतीय उद्यमियों को अपने पैर जमाने का एक बड़ा अवसर जरूर दिया।