पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में लोग पाकिस्तान के खिलाफ लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं, और असंतोष अब रोजमर्रा की मांगों तक सीमित नहीं है। जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के एक प्रोफेसर के विश्लेषण के अनुसार, विरोध अब बिजली और सस्ते गेहूं की मांग से आगे बढ़कर शासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के गहरे संकट तक पहुंच गया है।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने हाल में फिर से कश्मीर का मुद्दा उठाया और कहा कि केंद्र सरकार उनकी मदद नहीं कर सकती, जबकि पड़ोसी हर जगह कश्मीर का मुद्दा उठा रहा है। विश्लेषण का तर्क है कि हकीकत अलग है: पाकिस्तान अपनी नाकामी छिपाने के लिए जम्मू-कश्मीर की बात करता रहता है, और लेखक की राय में पाकिस्तान बनाने का विचार शुरू से ही गलत परिकल्पना रहा है।

ऐतिहासिक तर्क 26 अक्टूबर 1947 तक जाता है, जब महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर मौजूदा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर सहित पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाया था। लेखक के अनुसार, महाराजा ने कहा था कि वह पहले भारतीय हैं, फिर महाराजा।

इस इतिहास को आज के असंतोष की पृष्ठभूमि के रूप में पेश किया गया है। विश्लेषण के अनुसार, अब सवाल सिर्फ क्षेत्र का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि पाकिस्तान के प्रशासित क्षेत्रों के लोग खुद को प्रतिनिधित्व वाला महसूस करते हैं या नहीं।

कश्मीर से आगे अलगाववाद की आवाजें

असंतोष सिर्फ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर तक सीमित नहीं है। सिंध में सिंधुदेश की मांग है और बलूचिस्तान में आजादी की मांग है। बलूच संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तानी हुक्मरान उनके संसाधनों का दोहन करते हैं और उनकी पहचान दबाते हैं, और पाकिस्तान इन आंदोलनों को दबाने की कोशिश कर रहा है।

खैबर पख्तूनख्वा में भी हालात बिगड़ रहे हैं। यह प्रांत तहरीक-ए-तालिबान जैसे आतंकी संगठनों से जूझ रहा है, और यहां के पख्तून लंबे समय से संयुक्त भारत या स्वतंत्र पख्तूनिस्तान की मांग करते रहे हैं। विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तान कभी इस्लाम को खतरा, तो कभी सुरक्षा का हवाला देकर इन भावनाओं को खारिज कर देता है।

ऐतिहासिक जड़ें पाकिस्तान के शुरुआती विचार तक जाती हैं। 1930 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में मोहम्मद इकबाल ने पंजाब, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाने की बात कही थी, और इसे उत्तर पश्चिम भारत के मुसलमानों की नियति बताया था। विश्लेषण के अनुसार, उनके इस भाषण में न तो कश्मीर का जिक्र था और न ही बंगाल का।

पाकिस्तान बनने के बाद, विश्लेषण के अनुसार, बंगाली भाषियों पर उर्दू और अरबी औपचारिक रूप से थोप दी गई, जिससे भाषा और राजनीतिक अधिकारों को लेकर लंबा संघर्ष हुआ, जो 1971 में खत्म हुआ, जब पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। इस इतिहास को क्षेत्रीय पहचान दबाने के नतीजे की चेतावनी के रूप में पेश किया गया है।

PoK में विरोध का स्वरूप क्यों बदला

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में विरोध का स्वरूप बदल गया है। लोग अब सिर्फ बिजली और सस्ते गेहूं के लिए प्रदर्शन नहीं कर रहे, बल्कि विश्लेषण के अनुसार, अब उनके विरोध का कारण शासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संकट हो गया है।

2023 से शुरू हुए आंदोलन में जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी अहम भूमिका निभा रही है। जुलाई 2026 के चुनावों के दौरान पाकिस्तान में बसे कश्मीरियों के लिए आरक्षित 12 विधानसभा सीटों का विवाद भी आंदोलन की वजह बना। कमेटी का आरोप है कि ये आरक्षित सीटें स्थानीय सरकार को प्रभावित करती हैं, और वह इन्हें खत्म करने या बदलने की मांग कर रही है।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में निर्वाचित सरकार होने के बावजूद उसके पास कई अहम फैसले लेने का अधिकार नहीं है। विश्लेषण के अनुसार, 2018 के संशोधन से प्रशासनिक और विधायी शक्तियां स्थानीय परिषद से मुजफ्फराबाद को मिलीं, लेकिन इसकी कमान भी पाकिस्तान सरकार के पास है।

आर्थिक दबाव भी तनाव बढ़ा रहा है। विकास के लिए आवंटित बजट 75 अरब से घटाकर 63 अरब रुपये कर दिया गया, और ईंधन सब्सिडी के बजट में भी कटौती की गई। क्षेत्र में बेरोजगारी दर 11 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं में यह 23 प्रतिशत और युवाओं में 27 प्रतिशत है। सीमित अधिकारों और घटते बजट के बीच रोजगार और विकास बड़ी चुनौतियां बने हुए हैं।

भारत से क्या करने को कहा जा रहा है

इन विरोध-प्रदर्शनों ने यह सवाल उठाया है कि जब बड़े फैसले इस्लामाबाद लेता है, तो PoK में स्थानीय स्वशासन का क्या मतलब है। भारत ने वहां नागरिकों की मौतों और सुरक्षाबलों की कार्रवाई पर चिंता जताई है, और विश्लेषण के अनुसार, जून से अब तक कम से कम 90 लोगों की जान गई है। कुछ लोगों ने भारतीय तिरंगा लहराकर मदद मांगी है।

इन घटनाओं को 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के उस प्रस्ताव की याद के रूप में पेश किया गया है, जिसमें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान सहित उन क्षेत्रों पर भारत के दावे को दोहराया गया, जिन पर पाकिस्तानी कब्जा है। विश्लेषण का तर्क है कि भारत को अब पाकिस्तान के प्रोपेगैंडा को उजागर करना चाहिए, जिससे राजनीतिक प्रतिबद्धता पता चलेगी।

इस सलाह पर भारत अमल करता है या नहीं, यह टिप्पणीकारों का नहीं, नीति निर्माताओं का सवाल है। विश्लेषण से जो बात साफ है, वह यह है कि पाकिस्तान के क्षेत्रों में असंतोष बढ़ रहा है, और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में असंतोष अब उसके भागीदारों की ओर से अधिकारों और प्रतिनिधित्व के सवाल के रूप में पेश किया जा रहा है, न कि सिर्फ आपूर्ति और सब्सिडी के सवाल के रूप में।