शोधकर्ताओं का कहना है कि इस क्षेत्र की भूगर्भीय बनावट और मानसून व जलाशयों का पानी 20 किलोमीटर गहराई में दरारों तक पहुंचना इन बार-बार के झटकों की वजह बन रहा है।
17 घंटे में पांच झटके
श्रृंखला शुक्रवार 23 अक्टूबर रात 9:57 बजे 2.2 तीव्रता के झटके से शुरू हुई, फिर 10:18 बजे 1.8 का झटका आया। शनिवार दोपहर सिर्फ दस मिनट में तीन झटके आए: दोपहर 1:59 बजे 2.4, 2:02 बजे सबसे तेज 2.9 और 2:10 बजे 1.7 तीव्रता के झटके, जिससे 17 घंटे में धरती बार-बार हिली और लोगों में भय फैल गया।
लोगों ने रात से दोपहर तक बार-बार जमीन हिलती महसूस की, और झटकों के जारी रहने से इलाके में डर का माहौल बन गया।
अक्टूबर की शुरुआत से पैटर्न
17 घंटे की यह श्रृंखला तालाला-सासण क्षेत्र में अक्टूबर की शुरुआत से चल रहे स्वार्म का हिस्सा है। 1 अक्टूबर को 3.2 तीव्रता का भूकंप आया था, साथ में कई छोटे झटके भी, और ताजा श्रृंखला से तीन दिन पहले बुधवार 21 अक्टूबर को भी इसी इलाके से तीन किलोमीटर दूर 2.8 का भूकंप और हल्के झटके दर्ज हुए थे।
वैज्ञानिक ऐसी श्रृंखला को स्वार्म अर्थक्वेक कहते हैं, जिसमें बिना किसी एक बड़े मुख्य झटके के कई छोटे-मध्यम झटके दिन या हफ्तों तक आते रहते हैं।
अध्ययनों का निष्कर्ष
तालाला-सासण क्षेत्र पूर्व-उत्तर-पूर्व से पश्चिम-दक्षिण-पश्चिम की गिरनार फॉल्ट लाइन पर बसा है, और पास में ही नर्मदा और अरावली ट्रेंड के फॉल्ट भी हैं। गुजरात के भूकंप विज्ञान संस्थान (ISR) और ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र का गहन अध्ययन किया है, और उनका निष्कर्ष है कि भूकंप की असली वजह धरती के अंदर की फॉल्ट लाइनें हैं, जबकि पानी इनकी श्रृंखला को बढ़ा सकता है।
मानसून के बाद बरसाती पानी और जलाशयों का पानी जमीन में 20 किलोमीटर गहराई में धरती की पपड़ी की दरारों तक पहुंचता है, जिससे दरारों में दबाव बढ़ता है और कंपन पैदा होते हैं।
पास में डैम और नदी
भूकंप के केंद्र के आसपास एक तरफ कमलेश्वर डैम, दूसरी तरफ हिरण-2 और तीसरी तरफ मालणका डैम है, और हिरण नदी भी पास में बहती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि फॉल्ट जोन के पास डैम और नदी का यह संयोजन ही वजह है कि पानी यहां गहराई तक पहुंचता है और स्वार्म को बढ़ावा देता है।