गुजरात के राजकोट स्थित पंडित दीनदयाल उपाध्याय (पीडीयू) सिविल अस्पताल के एक वीडियो ने सरकारी अस्पतालों में मरीज सहायता सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में करीब 70 साल की एक बुजुर्ग महिला अपने बीमार पति को इलाज के लिए ले जाते समय खुद स्ट्रेचर खींचती हुई दिखाई दे रही है। वीडियो सोशल मीडिया पर फैलने के बाद अस्पताल प्रशासन ने जांच शुरू की और मरीज सहायता सेवाओं के लिए जिम्मेदार एजेंसी से पूरे मामले पर जवाब मांगा गया।
वीडियो में क्या दिखाई दिया
वीडियो में बुजुर्ग महिला अस्पताल परिसर में स्ट्रेचर खींचती हुई नजर आ रही है, जिस पर उनके पति लेटे हुए हैं। आम तौर पर अस्पतालों में मरीजों को एक विभाग से दूसरे विभाग तक ले जाने के लिए स्ट्रेचर के साथ सहायक कर्मचारी भी उपलब्ध रहते हैं, इसलिए यह सवाल उठ रहा है कि महिला को यह काम खुद क्यों करना पड़ा।
इस घटना के बाद यह चिंता भी सामने आई है कि उस समय सहायता उपलब्ध थी या नहीं। जांच में यह देखा जाएगा कि घटना के समय कौन से कर्मचारी ड्यूटी पर थे और महिला को मदद क्यों नहीं मिली।
अस्पताल प्रशासन ने आरएमओ स्तर पर बैठाई जांच
वीडियो सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन ने मामले की जांच शुरू की। अस्पताल के मीडिया समन्वयक डॉ. एम. एस. रॉय ने कहा कि मामला प्रशासन के संज्ञान में लाया गया है और रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर (आरएमओ) स्तर पर जांच शुरू की गई है।
प्रशासन का कहना है कि मरीजों की सहायता के लिए अस्पताल में हेल्प डेस्क और निर्धारित कर्मचारी उपलब्ध हैं। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि यदि किसी कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो उचित कार्रवाई की जा सकती है।
समिति गठित, सेवा एजेंसी से मांगा गया जवाब
बाद की रिपोर्टों के अनुसार घटना की जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया है। मरीज सहायता सेवाएं देने वाली एजेंसी और संबंधित कर्मचारियों से घटना के बारे में जवाब मांगा गया है।
स्वास्थ्य विभाग ने भी अस्पताल प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा है। जांच में यह देखा जाएगा कि कर्मचारी ड्यूटी पर मौजूद थे या नहीं, जिम्मेदारियां कैसे तय की गई थीं और जरूरी सहायता क्यों नहीं मिल पाई।
एंबुलेंस चालकों का विवाद अलग मामला है
रिपोर्टों में राजकोट सिविल अस्पताल के एंबुलेंस चालकों से जुड़ा एक अलग विवाद भी सामने आया है, जो वेतन कटौती और काम की परिस्थितियों से जुड़ा बताया गया है। अस्पताल के मीडिया समन्वयक ने कहा कि चालकों की ओर से कोई औपचारिक इस्तीफा या लिखित शिकायत नहीं मिली है और प्रशासन ने सेवा एजेंसी के माध्यम से तीन अतिरिक्त चालकों की व्यवस्था की, ताकि मरीजों पर असर न पड़े।
दोनों मामलों को आपस में जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार एंबुलेंस चालकों के विवाद और बुजुर्ग महिला के स्ट्रेचर वाली घटना के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं हुआ है।
सरकारी अस्पतालों में मरीज सहायता पर फिर उठे सवाल
इस घटना ने सरकारी अस्पतालों में मरीज सहायता व्यवस्था को लेकर चिंता फिर से बढ़ा दी है। बुजुर्गों, दिव्यांगों और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को अक्सर एक विभाग से दूसरे विभाग तक जाने में अतिरिक्त मदद की जरूरत पड़ती है और इलाज के साथ यह सहायता भी मरीज देखभाल का अहम हिस्सा है।
राजकोट मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मरीज सहायता सेवाएं उपलब्ध बताई जाती हैं, तो एक बुजुर्ग महिला को खुद स्ट्रेचर क्यों खींचना पड़ा। जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि चूक कर्मचारियों की कमी से हुई, जिम्मेदारियों के निर्धारण में गड़बड़ी से हुई या किसी अन्य कारण से।
अब आगे क्या होगा
जांच के नतीजों से यह तय होगा कि सेवा में कोई चूक हुई थी या नहीं और यदि हुई थी तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है। प्रशासन को यह भी जवाब देना होगा कि भविष्य में मरीजों और उनके बुजुर्ग परिजनों को समय पर सहायता मिले, इसके लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।